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"चिड़िया"

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                                      "चिड़िया"  ऊँची उड़ान, खुले आसमान की चाह में, छोड़ जंगल का घर, चिड़िया आ गयी थी शहर, पर शहर आकर, चिड़िया डर गयी है, उसके उड़ने की आरज़ू ,मर गयी है, चिड़िया जान गयी है ,यंहा गली-गली में शिकारी हैं, बहरूपिये सदाचारी हैं, जाने कब कंही से कोई आ के उसे दबोच ले, जाने कब कोई उसके मुस्कुराते पंख नोच ले , अब चिड़िया नहीं चाहती आज़ादी, नहीं चाहती खुला आसमान, नहीं चाहती पंख, अब उसे सूरज के उजालों से ,कंही ज्यादा रोशन लगता है  पत्तों के झुरमुट का अँधेरा, खुली हवाओं से ज्यादा सुकून देती हैं, उसे तिनको के घोसलें की चुभती दीवारें, चिड़िया सचमुच बहुत डर गयी है, मैंने बहुत दिनों से उसे नहीं देखा, लगता है, वो फिर से,  अपने जंगल वाले घर गयी है ............. हेमा 'अंजुलि' ...

'सन्नाटा'

Anjuli

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     'सन्नाटा' मेरे बाहर कितना कोलाहल है  तो फिर भीतर इतना सन्नाटा क्यों है ? क्या ये मेरी आधुनिकता है ..? या भीड़ से अलग हो जाने का भय  है    ? बलात्कार, हत्या, लूट, धोखाधड़ी .. हाहाकार मचा है चारों और  फिर भी मेरे भीतर .. इतनी खामोशी क्यों है..? क्या कानों में बहरापन है ? या शब्दों में गूंगापन ? या नेत्र पाषाण है मेरे ? या फिर मेरी आधुनिकता है ..?  या भीड़ से अलग हो जाने का भय  है    ? प्रश्न कि जटिलता .. और उत्तर ना जानने के आलस में छुपा लेती हूँ अपने नेत्रों को एक वी.आई .पी. ब्रांड के काले चश्मे में.. बेमतलब की बातों पे ठहाका लगाकर जाँच लेती हूँ अपने गूंगेपन को जी भर जियो ज़िन्दगी की तर्ज़ पर अपने कानों में हेडफोन लगाये बहरे ना होने का सबूत देने की  भरसक कोशिश करती हूँ... पर असफलता ही हाथ आती है क्योंकि अब भी बाहर कोलाहल है .. और भीतर भीषण सन्नाटा .. ये मेरी आधुनिकता...

Anjuli

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                                                                                        ' अंजुलि'   अंजुलि मेरे हृदय कि अंजुली जिसमें भरकर ढेर सारा प्रेम कर देना चाहती हूँ तुम्हे अर्पण बिना किसी शंका  , बिना किसी प्रश्न के , नही जानती कि होगा स्वीकृत या अस्वीकृत  तुम्हारे हृदय में जगह पायेगा   या धरती की गोद में समा जायेगा  मैं तो बस इतना जानती हूँ कि  अंजुली की नियति केवल अर्पण है.... और प्रेम की   समर्पण......  हेमा  ' अंजुलि'