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सच को जल्दी जान लो तो अच्छा है, चेहरों को जल्दी पहचान लो तो अच्छा है, ख़्वाबो के शहर अब छूट गए पीछे, अजनबी शहर है......... किसी का एहसान न लो तो अच्छा है । भीड़ देख के घबरा गया है नन्हा दिल,  सोचता है......... अब कोई बियावान हो तो अच्छा है । हेमा 'अंजुलि'
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वो जो आसमां से भी परे छुप कर बैठा है  ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ  वो क्यों फ़रिश्ता रूहों को अश्क देता है  ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों हर ताले की चाभी अपने पास रखता है  ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों तालों में बंद ख़ुशियों की बरसात रखता है ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों बनते होंसलों को तोड़ देता है ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों दो मिलती लहरों का रुख मोड़ देता है ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों गुनाहों के परिंदों को परवाज़ देता है ? ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों मासूमों को शराफ़त दे मार देता है ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ सवाल हैं अंतहीन मेरे ,तभी वो छुप के रहता है कि ग़र कहीं देख लिया …तो सवाल न कर दूँ 'हेमा 'अंजुलि'

गर मिलता जो साथ तुम्हारा

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गर मिलता जो साथ तुम्हारा तो कुछ लम्हे मैं भी जी लेती..... . तुम जो कहते तो बटोर लाती तुम्हारे लिए सूरज से उजाले चुरा लेती फूलों से ख़ुशबू  ले लेती उधार चंदा से चाँदनी माँग लेती धरती से एक टुकड़ा आँगन और सजा देती उसे अपने प्रेम से, बसा लेती मैं भी एक दुनिया , गर मिलता जो साथ तुम्हारा....… हेमा 'अंजुली'

मुझे जीने दो.....

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तुमने कहा, मैं बदल गई हूँ..... बदली नही हूँ मैं, बस भीतर से बाहर आ गई हूँ..... बाहर कितना उजाला है ना.. चमकता नीला आसमान,खुली हवा.. सच उड़ने को मन करता है... कहीं तुम मुझे फिर से भीतर तो नही धकेल दोगे ना...? मैं अब भीतर नही जाना चाहती कितनी घुटन है वहां हर वक्त शाम का धुंधलका सा छाया रहता है.. हर जगह एक खामोश सी बेबसी फैली रहती है... . हवाएं भी आने से कतराती हों जहां वहां कोई केसै जी सकता है भला.. इसीलिए अब तुम मुझे  बाहर ही रहने दो... और  जैसे   तुम जी रहे हो  वैसे ही मुझे भी जीने दो..... हेमा 'अंजुलि'

"चिड़िया"

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                                      "चिड़िया"  ऊँची उड़ान, खुले आसमान की चाह में, छोड़ जंगल का घर, चिड़िया आ गयी थी शहर, पर शहर आकर, चिड़िया डर गयी है, उसके उड़ने की आरज़ू ,मर गयी है, चिड़िया जान गयी है ,यंहा गली-गली में शिकारी हैं, बहरूपिये सदाचारी हैं, जाने कब कंही से कोई आ के उसे दबोच ले, जाने कब कोई उसके मुस्कुराते पंख नोच ले , अब चिड़िया नहीं चाहती आज़ादी, नहीं चाहती खुला आसमान, नहीं चाहती पंख, अब उसे सूरज के उजालों से ,कंही ज्यादा रोशन लगता है  पत्तों के झुरमुट का अँधेरा, खुली हवाओं से ज्यादा सुकून देती हैं, उसे तिनको के घोसलें की चुभती दीवारें, चिड़िया सचमुच बहुत डर गयी है, मैंने बहुत दिनों से उसे नहीं देखा, लगता है, वो फिर से,  अपने जंगल वाले घर गयी है ............. हेमा 'अंजुलि' ...

'सन्नाटा'

Anjuli

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     'सन्नाटा' मेरे बाहर कितना कोलाहल है  तो फिर भीतर इतना सन्नाटा क्यों है ? क्या ये मेरी आधुनिकता है ..? या भीड़ से अलग हो जाने का भय  है    ? बलात्कार, हत्या, लूट, धोखाधड़ी .. हाहाकार मचा है चारों और  फिर भी मेरे भीतर .. इतनी खामोशी क्यों है..? क्या कानों में बहरापन है ? या शब्दों में गूंगापन ? या नेत्र पाषाण है मेरे ? या फिर मेरी आधुनिकता है ..?  या भीड़ से अलग हो जाने का भय  है    ? प्रश्न कि जटिलता .. और उत्तर ना जानने के आलस में छुपा लेती हूँ अपने नेत्रों को एक वी.आई .पी. ब्रांड के काले चश्मे में.. बेमतलब की बातों पे ठहाका लगाकर जाँच लेती हूँ अपने गूंगेपन को जी भर जियो ज़िन्दगी की तर्ज़ पर अपने कानों में हेडफोन लगाये बहरे ना होने का सबूत देने की  भरसक कोशिश करती हूँ... पर असफलता ही हाथ आती है क्योंकि अब भी बाहर कोलाहल है .. और भीतर भीषण सन्नाटा .. ये मेरी आधुनिकता...

Anjuli

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                                                                                        ' अंजुलि'   अंजुलि मेरे हृदय कि अंजुली जिसमें भरकर ढेर सारा प्रेम कर देना चाहती हूँ तुम्हे अर्पण बिना किसी शंका  , बिना किसी प्रश्न के , नही जानती कि होगा स्वीकृत या अस्वीकृत  तुम्हारे हृदय में जगह पायेगा   या धरती की गोद में समा जायेगा  मैं तो बस इतना जानती हूँ कि  अंजुली की नियति केवल अर्पण है.... और प्रेम की   समर्पण......  हेमा  ' अंजुलि'