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16/17 साल पहले लिखी रचना आज सच महसूस होने लगी है यहाँ हर आदमी इस भीड़ में कितना अकेला है, बिना कश्ती बिना साहिल के हर तूफां को झेला है I चला जाता है जाने कौनसी राहों पे अनजाना, नहीं मंजिल न कोई कारवां अश्कों का रेला है I नहीं उम्मीद अपनों से ग़ैरों से गिला कोई, बड़ा ही अजनबी सा आज ये दुनिया का मेला है I नहीं मैं ये नहीं कहती, यहाँ इन्सा नही बसते, मगर इंसानियत के नाम पे क्या खेल खेला है I खिलोनों की तरह बिकते यहाँ रुपयों की खातिर लोग, है दौलत ही खुदा और आदमी मिट्टी का ढेला है I यकीं किसका करें यहाँ नहीं परछाई भी अपनी, हैं मेले रात की बाहों में तन्हा सुबह की बेला है I हेमा 'अंजुलि'

Hema Chandani

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आज आप दोस्तों के लिए मेरा लिखा व दिवंगत भाई का कम्पोज़ किया हुआ गीत "लोग कहते हैं कि वो चाँद है" उम्मीद है आप दोस्तों को पसंद आएगा

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बुक विमोचन " ख़ाली रह गयी अँजुली" में लडकियाँ गीत

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आज 4th मार्च.2018....मुम्बई के न्यूज़ पेपर "सामना' में छपी मेरी।पुस्तक "ख़ाली रह गयी अँजुली" की समीक्षा। समीक्षक श्री  Rajesh Vikrant  जी...
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मेरा काव्य संग्रह " ख़ाली रह गयी अँजुली' यदि किसी अन्य दोस्त को खरीदना है तो मुझे मेरे इनबॉक्स में अपना एड्रेस मेसेज करें ,,पुस्तक की कीमत 150 रूपये है ..दोस्तों से कोई डाक शुल्क नही लिया जायेगा

हैरान करती हैं लडकियाँ....on my youtube chennal

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my solo act

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मेरा प्रिय गीत "लड़कियाँ "Girls"

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