Anjuli

   
'सन्नाटा'















मेरे बाहर कितना कोलाहल है 

तो फिर भीतर इतना सन्नाटा क्यों है ?

क्या ये मेरी आधुनिकता है ..?

या भीड़ से अलग हो जाने का भय 
है  ?

बलात्कार, हत्या, लूट, धोखाधड़ी ..

हाहाकार मचा है चारों और 

फिर भी मेरे भीतर ..

इतनी खामोशी क्यों है..?

क्या कानों में बहरापन है ?

या शब्दों में गूंगापन ?

या नेत्र पाषाण है मेरे ?

या फिर मेरी आधुनिकता है ..? 

या भीड़ से अलग हो जाने का भय 
है  ?

प्रश्न कि जटिलता ..

और उत्तर ना जानने के आलस में

छुपा लेती हूँ अपने नेत्रों को

एक वी.आई .पी. ब्रांड के काले चश्मे में..

बेमतलब की बातों पे ठहाका लगाकर

जाँच लेती हूँ अपने गूंगेपन को

जी भर जियो ज़िन्दगी की तर्ज़ पर

अपने कानों में हेडफोन लगाये

बहरे ना होने का सबूत देने की 

भरसक कोशिश करती हूँ...

पर असफलता ही हाथ आती है

क्योंकि अब भी बाहर कोलाहल है ..

और भीतर भीषण सन्नाटा ..

ये मेरी आधुनिकता की लय है..?

या भीड़ से अलग हो जाने का भय 
है ?

पर इतना तो तय है

कि भीड़ से अलग हुये बिना 

नहीं मिलेंगे प्रश्नों के उत्तर …

ना ही खत्म होगा सन्नाटा ...

और ना ही जायेगा ये भय....

इसीलिए अब मुझको ही बाहर आना होगा

और भीड़ को भी पीछे लाना होगा

तभी ख़त्म होगा सन्नाटा 

तभी ख़त्म होगा कोलाहल.

और तभी ख़त्म होगा ये भय...


हेमा 'अंजुली'

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