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मई, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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सच को जल्दी जान लो तो अच्छा है, चेहरों को जल्दी पहचान लो तो अच्छा है, ख़्वाबो के शहर अब छूट गए पीछे, अजनबी शहर है......... किसी का एहसान न लो तो अच्छा है । भीड़ देख के घबरा गया है नन्हा दिल,  सोचता है......... अब कोई बियावान हो तो अच्छा है । हेमा 'अंजुलि'
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वो जो आसमां से भी परे छुप कर बैठा है  ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ  वो क्यों फ़रिश्ता रूहों को अश्क देता है  ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों हर ताले की चाभी अपने पास रखता है  ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों तालों में बंद ख़ुशियों की बरसात रखता है ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों बनते होंसलों को तोड़ देता है ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों दो मिलती लहरों का रुख मोड़ देता है ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों गुनाहों के परिंदों को परवाज़ देता है ? ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ वो क्यों मासूमों को शराफ़त दे मार देता है ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ सवाल हैं अंतहीन मेरे ,तभी वो छुप के रहता है कि ग़र कहीं देख लिया …तो सवाल न कर दूँ 'हेमा 'अंजुलि'

गर मिलता जो साथ तुम्हारा

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गर मिलता जो साथ तुम्हारा तो कुछ लम्हे मैं भी जी लेती..... . तुम जो कहते तो बटोर लाती तुम्हारे लिए सूरज से उजाले चुरा लेती फूलों से ख़ुशबू  ले लेती उधार चंदा से चाँदनी माँग लेती धरती से एक टुकड़ा आँगन और सजा देती उसे अपने प्रेम से, बसा लेती मैं भी एक दुनिया , गर मिलता जो साथ तुम्हारा....… हेमा 'अंजुली'

मुझे जीने दो.....

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तुमने कहा, मैं बदल गई हूँ..... बदली नही हूँ मैं, बस भीतर से बाहर आ गई हूँ..... बाहर कितना उजाला है ना.. चमकता नीला आसमान,खुली हवा.. सच उड़ने को मन करता है... कहीं तुम मुझे फिर से भीतर तो नही धकेल दोगे ना...? मैं अब भीतर नही जाना चाहती कितनी घुटन है वहां हर वक्त शाम का धुंधलका सा छाया रहता है.. हर जगह एक खामोश सी बेबसी फैली रहती है... . हवाएं भी आने से कतराती हों जहां वहां कोई केसै जी सकता है भला.. इसीलिए अब तुम मुझे  बाहर ही रहने दो... और  जैसे   तुम जी रहे हो  वैसे ही मुझे भी जीने दो..... हेमा 'अंजुलि'