संदेश

जुलाई, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
16/17 साल पहले लिखी रचना आज सच महसूस होने लगी है यहाँ हर आदमी इस भीड़ में कितना अकेला है, बिना कश्ती बिना साहिल के हर तूफां को झेला है I चला जाता है जाने कौनसी राहों पे अनजाना, नहीं मंजिल न कोई कारवां अश्कों का रेला है I नहीं उम्मीद अपनों से ग़ैरों से गिला कोई, बड़ा ही अजनबी सा आज ये दुनिया का मेला है I नहीं मैं ये नहीं कहती, यहाँ इन्सा नही बसते, मगर इंसानियत के नाम पे क्या खेल खेला है I खिलोनों की तरह बिकते यहाँ रुपयों की खातिर लोग, है दौलत ही खुदा और आदमी मिट्टी का ढेला है I यकीं किसका करें यहाँ नहीं परछाई भी अपनी, हैं मेले रात की बाहों में तन्हा सुबह की बेला है I हेमा 'अंजुलि'