16/17 साल पहले लिखी रचना आज सच महसूस होने लगी है

यहाँ हर आदमी इस भीड़ में कितना अकेला है,
बिना कश्ती बिना साहिल के हर तूफां को झेला है I

चला जाता है जाने कौनसी राहों पे अनजाना,
नहीं मंजिल न कोई कारवां अश्कों का रेला है I

नहीं उम्मीद अपनों से ग़ैरों से गिला कोई,
बड़ा ही अजनबी सा आज ये दुनिया का मेला है I

नहीं मैं ये नहीं कहती, यहाँ इन्सा नही बसते,
मगर इंसानियत के नाम पे क्या खेल खेला है I

खिलोनों की तरह बिकते यहाँ रुपयों की खातिर लोग,
है दौलत ही खुदा और आदमी मिट्टी का ढेला है I

यकीं किसका करें यहाँ नहीं परछाई भी अपनी,
हैं मेले रात की बाहों में तन्हा सुबह की बेला है I

हेमा 'अंजुलि'

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Anjuli