वो जो आसमां से भी परे छुप कर बैठा है
ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ
वो क्यों फ़रिश्ता रूहों को अश्क देता है
ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ
वो क्यों हर ताले की चाभी अपने पास रखता है
ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ
वो क्यों तालों में बंद ख़ुशियों की बरसात रखता है
ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ
वो क्यों बनते होंसलों को तोड़ देता है
ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ
वो क्यों दो मिलती लहरों का रुख मोड़ देता है
ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ
वो क्यों गुनाहों के परिंदों को परवाज़ देता है ?
ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ
वो क्यों मासूमों को शराफ़त दे मार देता है
ग़र मिल जाए तो सवाल करूँ
सवाल हैं अंतहीन मेरे ,तभी वो छुप के रहता है
कि ग़र कहीं देख लिया …तो सवाल न कर दूँ
'हेमा 'अंजुलि'

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